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गोपाल मंदिर इतिहास

भक्तिपथ... १९२९ में की गई थी इस पथ की स्थापना
झाबुआ की पावन धरा पर स्थापित श्री गोपाल मंदिर मात्र एक देवालय नहीं, बल्कि हज़ारों भक्तों की अटूट श्रद्धा, निस्वार्थ सेवा और दिव्य गुरु-परंपरा का जीवंत प्रतीक है। इस मंदिर की नींव और इसका इतिहास त्याग और समर्पण की अनूठी गाथा बयां करता है। गोपाल मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि झाबुआ की आध्यात्मिक चेतना, श्रद्धा, सेवा और समर्पण का जीवंत प्रतीक है। यह वह पावन धाम है जिसने दशकों से हजारों भक्तों को भक्ति, प्रेम और मानव सेवा के मार्ग पर प्रेरित किया है। मंदिर का इतिहास केवल ईंट और पत्थरों से निर्मित भवन की कहानी नहीं, बल्कि उन असंख्य भक्तों के त्याग, श्रमदान और अटूट विश्वास की अमर गाथा है जिन्होंने इसे अपने हाथों और हृदय से आकार दिया। इस भव्य मंदिर के निर्माण की पावन यात्रा वर्ष १९६८ में प्रारंभ हुई थी। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसके निर्माण में किसी भव्य पूंजी से अधिक भक्तों के पसीने और भक्ति का योगदान था। स्थानीय श्रद्धालुओं ने स्वतः स्फूर्त होकर दिन-रात श्रमदान किया, ईंट-पत्थर उठाए और अपने हाथों से इस पावन धाम को आकार दिया। तीन वर्षों के अथक परिश्रम और समर्पण के पश्चात, ६ मई १९७१ को मोहिनी एकादशी के पावन और शुभ अवसर पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मंदिर का भव्य शुभारंभ हुआ और प्रभु गोपाल जी की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। 

 दिव्य गुरु-परंपरा की शुरुआत

इस आध्यात्मिक मार्ग की स्थापना और इतिहास मुख्य रूप से तीन महान गुरुओं के इर्द-गिर्द केंद्रित है:
  • आद्य गुरु - बड़े बापजी (पूज्य रामशंकर जानी): भक्ति के इस पावन पथ की शुरुआत वर्ष १९२९ में बड़े बापजी ने की थी। इनका मूल पैतृक स्थान वर्तमान गुजरात के जंत्राल में है।
  • द्वितीय गुरु - छोटे बापजी (पूज्य घनश्याम जानी): बड़े बापजी के पश्चात उनके सांसारिक पुत्र घनश्यामराय जानी जी (जिन्हें भक्तजन आदरपूर्वक 'छोटे बापजी' कहते हैं) ने इस गद्दी और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व को संभाला।
  • तृतीय गादीपति - गोपाल प्रभु (पूज्य रविकांताबेन जानी): ४ जनवरी १९२० (पौष चौदस) को जन्मीं रविकांताबेन जानी इस पथ की तीसरी गादीपति बनीं। उनकी अगाध भक्ति और दैवीय आभा को देखकर भक्तों ने उन्हें 'गोपाल प्रभु' का नाम दिया। वर्ष १९६० से लेकर १९७५ में देह त्यागने तक, गोपाल प्रभु ने हज़ारों श्रद्धालुओं को सन्मार्ग दिखाया। इस विचार और पथ के केवल ये तीन ही मुख्य गुरु रहे हैं।

मंदिर  की विलक्षण एवं अनूठी परंपराएँ

गोपाल मंदिर देश के अन्य पारंपरिक मंदिरों से सर्वथा भिन्न और अनूठा है। इसकी मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
  • मूर्ति रहित 'चित्र पूजा': वर्ष १९६० में अपने महाप्रयाण (देह त्यागने) से ठीक पहले, छोटे बापजी ने आध्यात्मिक मार्ग में एक बड़ा बदलाव किया। उन्होंने मूर्ति पूजा के स्थान पर 'चित्र पूजा' (तस्वीर की आराधना) का मार्ग दिखाया। यही कारण है कि गोपाल मंदिर में कोई मूर्ति स्थापित नहीं है।
  • ध्वज और घंटी का निषेध: पूर्णतः शांत और ध्यानमयी वातावरण के लिए इस मंदिर के शिखर पर न तो कोई ध्वज (झंडा) लगाया जाता है और न ही यहाँ घंटियाँ बजाई जाती हैं।
गोपाल प्रभु की इच्छा थी कि यहां के लोगों के लिए पक्के मकान बने। तब मंदिर के साथ ही यहां एकसाथ ३३ मकान बनाए गए थे। तब हाउसिंग बोर्ड से लोन लिया गया था। ये शहर की पहली प्लानिंग के साथ बनी कॉलोनी थी। मंदिर निर्माण पश्चात् मंदिर सुचारू रूप से चलाने हेतु सर्वसमिति से गोपाल मंदिर ट्रस्ट का गठन किया गया.
मोटा भाई...
गोपाल मंदिर के आधार स्तंभ: पं. विश्वनाथ जी त्रिवेदी
स्व. पं. श्री विश्वनाथ त्रिवेदी
आधार स्तंभ
जन्म: १०-०९-१९१८
देवलोकगमन: २२-०८-१९९१
गोपाल मंदिर के निर्माण में भक्त मंडल व ट्रस्ट के सभी सदस्यों के साथ ही ट्रस्ट में संरक्षक एवं वरिष्ठ ट्रस्टी श्री विश्वनाथजी त्रिवेदी मोटा भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही। श्री मोटा भाई बचपन से ही गंभीर एवं चिन्तनशील रहे । इन्हे दर्शन , मनोविज्ञान,ज्योतिष का अध्यन करने के साथ ही सुयोग्य अध्यात्मिक गुरु कि तलाश रही । इसी क्रम में एक बार रेल यात्रा के दोरान एक विभूति से इनकी मुलाकात हुई । अल्प बातचीत में विभूति ने श्री मोटा भाई के अतीत जीवन कि बाते बताई और अध्यात्मिक जीवन कि भविष्य वाणी करने के साथ उत्कृष्ट व समर्थ गुरु के सानिध्य में अध्यात्मिक साधना करने का सुअवसर शीघ्र ही मिलने कि बात कही। 
        गुजरात स्थित दाहोद में इनकी एक बहन का विवाह हुआ था तथा इनके बहनोई श्री मंगू भाई त्रिवेदी ने श्री मोटा भाई को गुजरात में जन्त्राल में प्रसिद्ध समर्थ गुरु प .पूज्य श्री रामशंकर जी जानी के बारे में बताया । चर्चा के अंतर्गत इन्हे आभास हुआ के जिन समर्थ गुरु कि इन्हे तलाश थी तथा रेल में मिले उस विभूति ने आध्यात्मिक गुरु के शीघ्र ही मिलने कि बात कही थी वे शायद यही है। वे अपने बहनोई के साथ जन्त्राल में प .पूज्य श्री रामशंकर जी जानी (बडे बापजी) के पास पहुचे । प्रथम भेट में ही चिरकाल से परिचित जैसा स्नेह व आशीर्वाद प्राप्त हुआ। बडे बापजी ने जन्त्राल में ऋषिकुल कि स्थापना करे चुनिन्दा शिष्यों को भजनों ,उपदेशो, सत्संग व पत्रों के माध्यम से दीक्षित किया ।
0 वर्षों की गौरवशाली यात्रा

मंदिर शुभारंभ

६ मई १९७१

मोहिनी एकादशी
         सदगुरु श्री रामशंकर जी जानी ने दिनांक १६-०२-१९४७ को देह त्याग किया। उनके देहत्याग के पश्चात् उनके जयेष्ट पुत्र प .पूज्य श्री घनश्याम जी जानी ने बडे बापजी कि आध्यात्मिक विरासत को सत्संग ,सूत्रों से पोषित , पल्वित व फलित किया । बडे बापजी कि तरह ही प .पूज्य श्री घनश्याम प्रभु ने मोटा भाई को गले लगाया व अपार स्नेह दिया। घनश्याम प्रभु व मोटा भाई का साथ १४ वर्ष का रहा तथा दिनांक ०८-०७-१९६० को मात्र ४० वर्ष कि आयु में प .पूज्य श्री घनश्याम प्रभु(छोटे बापजी) ने अपना देहत्याग किया। प .पूज्य घनश्याम प्रभु के देहत्याग के बाद गुरु पत्नी जिन्हे भक्त गण प्रेम व आदर से गोपाल के नाम से पुकारते थे का आसीन स्नेह मोटा भाई को मिला ।
          वर्ष १९६८ में दो भक्त माताश्री गोपाल के आशीर्वाद के लिए भरूच माँ श्री के निवास पहुचे । माताश्री ने दोनों भक्तो को झाबुआ में गुरूभइयो कि झोपडी बांधने कि द्रष्टि से जमीन कार्य करने को कहा । माँ गोपाल से चर्चा में भक्तो ने कालोनी के निर्माण के साथ एक बड़ा कामन हाल चाहिए जिस पर केवल हाल बनाने कि सहमती दी गयी। सामूहिक भजन व पूजन के लिए भी एक स्थल मंदिर के रूप में बनाने का आग्रह किया जिस पर माँ गोपाल ने विषयक स्वीकृति दे दी। परन्तु पहले गुरु भाइयो के बंगले कार्य को ही प्राथमिकता दी जावे। मंदिर एवं कालोनी निर्माण हेतु श्री गणेश के लिए १००१/- माँ गोपाल ने श्री मोटा भाई को दिए और कहा कि अच्छा मुहर्त देखकर मंदिर का निर्माण शुरू करे । इसके साथ ही माँ गोपाल ने कालोनी निर्माण के सम्बन्ध में कुछ विशेष निर्देश दिये ।
  1. मंदिर के लिए चंदा नहीं लेना
  2. किसी का नाम लिखी वस्तु मंदिर में नहीं लगानी।
  3. मंदिर में मूर्ति नहीं लगानी।
  4. मंदिर में गुम्बज,घंटा,घड़ियाल,ध्वज,त्रिशूल,कलश आदि नहीं लगाना ।
  5. मंदिर दुसरो के देखने हेतु नहीं बनाना ।
  6. मंदिर केवल भक्तो के भजन हेतु बनाना
  7. मंदिर में केवल पांच फोटो लगाना।
  8. मंदिर में पुजारी के रहने के लिया पीछे कि दीवार एक हो।
  9. रसोई में छोटी अलमारी व फ्लेट रेक हो।
  10. बंगले के बडे कमरे में बड़ी अलमारी हो।
        इस प्रकार वर्ष १९६८ में कालोनी एवं मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ। इस पूरे परिवेश को गोपाल कालोनी का नाम दिया गया। मंदिर निर्माण पूर्ण होने के पश्चात् मंदिर उदघाटन के अवसर पर माँ गोपाल को मंदिर ले जाने का प्रस्ताव किया गया तो माँ गोपाल द्वारा इंकार करते ही फ़रमाया:-
"मुझे किसे बताना है कि कीर्ति मिली है जब परमात्मा है तो में हो ही नहीं सकता । यह मंदिर और यह आवास गृह तो अपने भक्त बालको के लिए एक बहुत बड़ी सोगात है ।"
        इस प्रकार माँ गोपाल ने दिनांक ०७-०२-१९७५ को अपनी सांसारिक यात्रा पूर्ण कर विश्राम हेतु स्वधाम प्रस्थित हुई। तथा आज माँ श्री के ही घर को ही "ऋषिकुल मंदिर" में परिवर्तित कर जन्त्राल में भव्य मंदिर का निर्माण किया गया । जहा अपनी शारीरिक हयाती के बिना ही बड़ी संख्या में भक्त गण गुरु पूर्णिमा व इसी प्रकार हर पूर्णिमा पर आते रहते है।
        झाबुआ के "श्री गोपाल मंदिर" तथा लिमखेडा के" श्री घनश्याम" मंदिर एवं ग्राम बावड़ी के मंदिर "ऋषिकुल आश्रम बावड़ी" में भी ऋषिकुल मंडल के भक्त दर्शन , सत्संग का लाभ उठाते है ।   इस पावन पथ की व्यापकता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र ,दिल्ली सहित देश भर के २२ राज्यों में गुरु-भक्त अपनी सेवा और भक्ति का भाव संजोए हुए हैं। इतना ही नहीं, यह आध्यात्मिक विचारधारा अब सात समंदर पार भी पहुँच चुकी है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, स्विट्जरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, दुबई (संयुक्त अरब अमीरात), नेपाल, न्यूजीलैंड और सिंगापुर जैसे देशों में भी गुरु-भक्तों का एक विस्तृत परिवार मौजूद है, जो अपनी जड़ों से जुड़कर निरंतर इस ऋषिकुल के उत्थान में अपना योगदान दे रहे हैं।
आज हमारा यह परिवार भौगोलिक सीमाओं को पार कर चुका है। देश और विदेश में बसे इन लाखों भक्तों का एक ही ध्येय है—गुरु के बताए मार्ग पर चलना और जनकल्याण की भावना को जन-जन तक पहुँचाना। गोपाल मंदिर झाबुआ में आने वाले हर व्यक्ति को यहाँ के कण-कण में ऐतिहासिक श्रमदान की खुशबू, समाज कल्याण की सोच और गुरुओं की दिव्य चेतना की अनुभूति होती है। यह स्थान अध्यात्म और सामाजिक सरोकार के सुंदर समन्वय का एक अनुपम उदाहरण है। प .पूज्य श्री मोटा भाई ( श्री विश्वनाथ जी त्रिवेदी) द्वारा जीवन पर्यंत तक प्रभु कि सेवा कि गयी व दिनांक २२-०८-१९९१ को उनका देहावसान हुआ। तत्पश्चात सेवाभार एवं पूजा अर्चना का कार्य मोटा भाई के जयेष्ट सुपुत्र श्री रविन्द्र नाथ जी त्रिवेदी द्वारा आरम्भ कि गई जिन्होने पूरी निष्ठा व आस्था के साथ प्रभु कि सेवा कि एवं वर्ष २००७ में उनका देवलोकगमन हुआ । वर्तमान में मंदिर कि पूजा अर्चना स्व पं श्री रविन्द्र नाथ जी के जयेष्ट सुपुत्र पं रूपक त्रिवेदी द्वारा कि जा रही है ।
 
गुरु मंत्र
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